शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

मांझी कहां है???


कुछ महीनों पहले तक "मांझी" नाम बिहार की राजनीति में तुफान मचाने वाला व्यक्तित्व का था। परंतु आज "मांझी" इतिहास के गर्भ से आपार प्रेरणाश्रोत के रूप में उभरे स्वर्गीय दशरथ मांझी के संदर्भ में लिया जा रहा है जो अपने अद्भुत कारनामें के लिए आज लगभग 20 सालों के बाद देश से सिनेमा के माध्यम से रूबरू हो रहे है,या यूं कहें कि देश उनसे रूबरू हो रहा है। हालांकि यदा कदा उनकी ये कारनामों वाली पोथी अखबारों में खुलती रही होगी, पर शायद हमलोगों ने उसे नजरअंदाज कर दिया होगा।
जब ये पूरी कहानी रूपहले पर्दे पर आइ है तो शायद अब हमलोगों ने गुगलिया ग्यानवर्धन शुरू किया और "मांझी" और उनके और एक पहाड़ के बीच की 20 सालों तक चली लंबी लड़ाई की व्याख्या कर रहे हैं। खैर जो प्रेरणादायी है उस कारनामें को जरूर मौका मिलना चाहिए कि वो लोंगों को प्रोत्साहित कर सके। परंतु अगर आपको ऐसी घटनाएं प्रेरित करती हैं और आप उस गुगलिया ग्यान को प्रेरणा का स्वरूप देना चाहते हैं और "मांझी" की इस कहानी के रूपहले पर्दे के अवतार को सिर्फ इसलिए नहीं देखना चाहते क्योंकि कहानी का सार आपने समझ लिया है तो मेरा यकीन मानिए आप इसे देखने जरूर जाइए।
इसमें आपके देखने के लिए बहुत कुछ है। हमारे लिए ये एक प्रेरणादायी कहानी से बढ़कर है, हमारे समाजिक तानेबाने कि वो कमियां जिसकी पृष्ठभूमि से ही "मांझी" की कहानी शुरू होती है, उसको बेहद खुलेपन से और शायद उस समय के सत्य के हिसाब से दिखाया गया है।50-60 के दशक में होते छूत-अछूत और दलित शोषण,जमींदारी जैसे सामाजिक दोष को आईना दिखाती है यह सिनेमा, गांव के मुखिया और सरकारी महकमें की सांठगांठ से होते भ्रष्टाचार को बहुत नजदीक से छू गई है। नक्सलवाद के जन्म और उसकी सोच को भी छोटे से अंश में ही सही पर बखूबी दर्शाया गया है।दशरथ मांझी की अपनी कहानी के साथ ही साथ चलने वाली ये समाजिक उतार-चढ़ाव की कहानी बहुत कुछ बयां करती है। एक नवयुवक का बुढ़े दशरथ से ये कहना की "आप तो बहुत बड़ा काम कर रहे हैं, हम तो बचपन में आपको पगला पहाड़तोड़वा बाबा कहते थे और पत्थर मारते थे" या फिर शुरूआती दौर में उसके इस जूनून को नकारत्मक दृष्टि से देखने वाले लोंगों की ख्यालाती बदलाव इस बात के सबूत थे कि हम सामाजिक रूप से परस्पर परिपक्व होते रहे थे।हाल के दिनों में एक साथ एक पर्दे पर इतना कुछ देखने को नहीं मिला जो हमें सामाजिक रूप से खुद में झांकने के लिए मजबूर करें।
हम कुछ दृश्यों पर ओह!! आह!!  कर सकते हैं। पर इस बात को भी मानना पड़ेगा कि हमारी संवेदना इन सिनेमा घरों तर ही सीमित रह सकती है अगर हम उन दृश्यों को काल्पनिक मानें, जो की है नहीं,  या फिर आज के परिवेश में ऐसी घटनाओं को नगण्य मान ले। खैर सच्चाई यही है कि यह कहानी किसी दशरथ मांझी की अपनी लड़ाई से बहुत ज्यादा दिखाती है, बशर्ते हम उसे देखने के लिए तैयार हों। ये बिहार के गया जिले का गेहलोर गांव की कहानी ही नहीं है ये हिंदुस्तान के हर गांव की कहानी है जो 50-60 साल तक खुद तक पहुंचने वाले सड़क और मूल-भूत सुविधाओं की ताक में था और अब भी है। बस गेहलोर की कहानी अलग इसलिए है कि वहां दशरथ मांझी ने अकेले के दम पर पहाड़ तोड़ कर रास्ता बना डाला। आज दशरथ मांझी के इस कारनामें को रूपहले पर्दे पर देख कर हम गर्व कर सकते या फिर कुछ सवालों के जवाब ढ़ूंढ़ने की कोशिश करें कि क्या आज भी सारे मांझी उसी तरह से जी रहे हैं, जैसा कुछ कुछ पर्दे पर देखने को मिल रहा है या फिर वाकई हर मांझी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकता है?

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

देवालयों का होता अनादर!!!!

हम एक ऐसे राजतंत्र की जनता है जिसने प्रजातंत्र का मुखौटा चढ़ाए हुए है। जहां राजा प्रबल होता है, और उसकी वाणी पत्थर की लकीर। उदाहरण के तौर पर "पहले शौचालय फिर देवालय" ऐसा कह कर जहां हमारे सेनापति श्री जायराम रमेश ने हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाई तो यही बात हमारे तत्कालिक मनोनीत प्रधानमंत्री जी के कहे से हमारी जरूरत बन गई।दम तोड़ते हुए प्रजातंत्र की ऐसी कई मिसालें आपको मिल सकती हैं।
खैर जैसे मानव जाती का विस्तार ही मानव होने का मूल उद्देश्य है। उसी प्रकार हर धर्मावलंबी अपने धर्म का विस्तार की जुगत में लगा रहता है, ऐसे में हर राजा के उपर भी अपने धर्मावलंबियों का दबाव बना रहता है। हाल ही में खाड़ी देशों के दौरे से लौटे हमारे प्रधानमंत्री जी हम हिंदु देशवासियों के लिए कुछ ऐसे ही धर्म विस्तार की सौगात लेकर आए। शारजाह का वो स्टेडियम जो भारत में उस खेल से जाना जाता था जो देश की धार्मिक अस्मिता में घुसपैठ कर रहा था, ऐसी घुसपैठ जिसमें कि इस खेल को धर्म के समकक्ष लाकर खड़ा करने वाले वो योद्धा खुद को देवालयों में स्थापित करना चाह रहे थे।हमारे प्रधानमंत्री जी ने इस खेल की मंशा को, जिसे पूरा करने के लिए सचिन तेंदुलकर और  महेंद्र सिंह धोनी जैसे सेनापति तत्पर थे, शारजाह में उन्हीं के घर में इस बात का ऐलान करते हुए धराशायी कर दिया कि आबु-धाबी की सरकार ने उन्हें मंदिर के लिए जमीन देने का वायदा किया है। और ऐसा ऐलान करते हुए उन्होंने उन सभी श्रोताओं/दर्शकों को वहां के शेख़ साहब के सम्मान में खड़ा करा दिया जो अब तक सचिन के छक्कों से उत्तेजित होकर खड़े होते थे। अगर इसे पढते हुए आपको सचिन तेंदुलकर का वो दृश्य याद आ जाए  जिसमें वो एक योद्धा की तरह अकेले ही अस्ट्रेलिया की सेना से लोहा ले रहे हैं और आंधी तुफान के बावजूद रणभूमि में डटे हुए हैं तो इस बात को मान लीजिए कि आप धार्मिक रूप से उस घुसपैठ के शिकार हो चुके थे जिसके लिए सेनापति सचिन तेंदुलकर तत्पर थे।
बहरहाल मोदी जी का ये ऐलान देश को और खास कर हिंदू धर्म को गौरवान्वित होने से ज्यादा अपने गौरव के प्रचार और प्रसार का मौका देता है। मैं ऐसा कहते हुए गुगल के हवाले से निकले 9 जुलाई 2013 की टाइम्स आफ इंडिया की उस खबर को अमान्य करता हूं जिसमें लिखा है कि एक अरब व्यापारी ने एक हिंदू संस्था को मंदिर बनाने के लिए जमीन देने का ऐलान किया है। खैर, ये गुगलिया दोष है, जो बहुत हद तक वो नाड़ी दोष है जिसके होने पर आपको वैवाहिक संबंधों को निभाने पर सवालिया निशाना खड़ा करता है। ऐसे काल्पनिक दोषों का या तो पूर्ण रूप से विरोध करें या फिर समर्थन, तभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।
शायद ही कोई आस्तिक हिंदू हो जो इस ऐलान से गौरवान्वित ना हुआ हो, और अपने गौरव का प्रदर्शन ना किया हो। मैं उन निराशावादी लोगों की बात नहीं कर रहा जिनकी पहचान मोदी जी ने अपने 15 अगस्त के राष्ट्रसंबोधन में टोका-टिप्पणी करने वालों के रूप में कराई थी जो बेवजह ही व्याख्या करने बैठ जाते हैं। ये वो लोग हैं जो मोदी जी की इस महान कीर्ति को अबू-धाबी के लोगों की भलमनसाहत की पहचान बता रहे है और मोदी जी को ही नसीहत दे रहें हैं कि उनसे कुछ सीखें। पता नहीं ऐसे लोग किस बात पर मोदी जी की तारीफ करेंगे, नसीहत देने वाले ये क्यों नहीं देख रहे कि आखिर मोदी जी भी वहां मसजिद में गए थे, जिससे हमारे देश के मुसलमान भाई भी गौरवान्वित हुए। अगर ऐसे ही कर्मठता से मोदी जी डटे रहे तो यकीन मानिए वो मंदिर वालों को मस्जिदों तक और मस्जिद वालों को मंदिर तक लाने कामयाब हो जाएंगे । बशर्ते ये निराशावादी लोग तिल का ताड़ बनाना छोड़ दें।
वैसे तो सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में शौचालयों की कमी है, जिसे लगातार पूरा किया जा रहा है। परंतु ऐसा कोई आँकड़ा नहीं है जो ये बताए कि देश में कितने देवालयों की जरूरत है और कितने इस वक्त हैं। सच्चाई तो ये है कि आबु-धाबी में बनने वाली देवालय में वहां की सरकार की हामी का बड़ा महत्व है, वहां सरकार तय करेगी कि देवालय कहां बनेगा, और इस बात का ख्याल रखा जाएगा कि उससे मानवीय मूल-भूत सुविधाओं को कोई क्षति तो नहीं पहुंचेगी, इसके ठीक विपरीत भारत में देवालयों का निर्माण देवों के अपनी मर्जी पर है, जो कहीं भी प्रकट हो सकते है और फिर उनका उसी स्थान पर स्थापित होना हमारे लिए धार्मिक जिम्मेदारी है, जो हमारी अपनी मूल-भूत सुविधाओं या कहें कि विकास से ज्यादा जरूरी है। उदाहरणार्थ आप अपने शहर के सड़कों पर घूम लें तमाम ऐसे दृश्य मिलेंगे जहां हमारी आस्था हमारे मूल-भूत सुविधाओं से टकराती मिलेंगी। अपने शहर बनारस की कुछ तस्वीरें साझा कर रहा हूं, जिसे देखकर लगता है कि कैसे विकास के नाम पे हम अपनी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा रहें हैं।
बी. एच. यू अस्पताल के सामने पीपल देव का अनादर। 

भगवान् शिव की मंदिर के दोनों तरफ से जाती ये सड़क। 




पद्मश्री चौराहे पर अपने अस्तित्व के लिए लड़ती शितला मात


पद्मश्री चौराहे पर ही विराजित
हनुमान जी।

 मैं मांग करता हूं भारत सरकार से कि ऐसे देवालयों को आंकलन हो और उन सुविधाओं को,जो विकास के नाम पे हमारी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाती हैं,जड़ से उखाड़ फेंका जाए।पर शायद सरकार से उम्मीद करना अतिरेक हो, फिर भी मैं खुद को निराशावादी नहीं मानता। मैं उस प्रजातंत्र का हिस्सा हूं जहां इस मामले में मेरी सारी आशा अपने राजा बाहुबली से है जो सुविधानुसार इन देवालयों को अपने कंधे पर रख कर विस्थापित कर सके जैसे उसने अपनी मां की सुविधा के लिए शिवलिंग को अपने कंधों पर रख कर गंगा मैया के गोद में स्थापित कर दिया था। बहरहाल आप अपने घरों के दिवारों पे लगे पीपल के पेड़ों को जल अर्पित करते रहें। क्योंकि सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं कि वो हमारे लिए पीपल के बाग लगाए। विकास के नारों के बीच हमारी धार्मिक अस्मिता फिर से खतरे में तो नहीं ना आ जाएगी? कहीं क्रिकेट के बाद विकास का ये नारा हमारी धार्मिक विश्वासों में घुसपैठ तो नहीं कर रही है? अगर हां तो फिर इस विकास के सेनापति कौन और कहां हैं?

सोमवार, 27 जुलाई 2015

वो मसान देखने क्यों आए थे????

कल रविवार के दिन मसान देख पाना संभव न हुआ, कारण तो बहुत हुए पर मूलतः बाहुबली और भाईजान ही कारण थे जो टिकट खिड़की पे अब तक अपने प्रशंसकों से जद्दोजहद करवा रहे थे। उनकी अपार कमाई और प्रशंसकों के दिवानेपन के आगे "मसान" बेहद छोटा और ठुल्ला साबित हो रहा था।
भाईजान ने तो अखिलेश जी से मनोरंजन कर भी माफ करा ली और बाहुबली को ईनामस्वरूप मोदी जी से मुलाकात हो गई जिसकी तसवीरें आप तक पहुंच चुकी होंगी। और "मसान" के हाथों एक्का दुक्का कामयाबी ही लगी मसलन कांस फिल्म महोत्सव में फिप्रेस्की अवार्ड और कई लोगों ने लिखा कि अच्छी पिक्चर है,देख आइए। वैसे इन कामयाबियों का हवाला मेरे किसी भी मित्र गण को प्रेरित नहीं कर सका,और मैं भी हार कर अकेले ही निकल पड़ा कि चलूं देख आऊं कि अब जिंदगी के किस पहलू से अवगत होने का मौका मिले। हांलाकि आर्ट सिनेमा या रियलिस्टिक सिनेमा के नाम पर हमने "फायर" और "बैंडिट क्वीन" जैसी पिक्चर भी 15 साल पहले अपने स्कूली दिनों में मित्रों के साथ देखी है,पर एक अलग संदर्भ में, जिसका उल्लेख करना उचित नहीं है। पर धीरे धीरे ऐसे आर्ट और रियलिस्टिक सिनेमा ने अपनी सही जगह स्थापित कर ली है।
आज फिर खिड़की पर भीड़ देख कर हदस गया और लगा कि फिर गलती हो गई कि आनलाइन टिकट क्यों न बुक किया। खैर,भला हो उस सज्जन मानुष का जिसने मेरी भी टिकट ली और वो भी मेरे तरह ही अकेले आए थे यहां तक। थियेटर के अंदर पहूंच कर थोड़ी भीड़ देखी तो लगा कि चलिए कही तक तो ठेहरती है मसान, बाहुबली और भाईजान के आगे।
अपनी सीट पर पहुंच कर उन भाई साहब को धन्यवाद किया जिन्होंने टिकट लिया था और पिक्चर छुटने की जल्दबाज़ी में उस समय न कर पाया था। उनकी हल्की मुसकान ने भला मानषता की चिराग फोड़ दी। हमारी पंक्ति में बैठने वाले सभी अकेले ही आए थे। सब की अपनी अपनी मजबूरी रही होगी जरूरी नहीं की हम सभी का कारण एक ही हो।
खैर पिक्चर के पहले 15 मिनट में ही सबकुछ आम सिनेमा की तरह सामान्य हो गया जब देवी के उत्तेजक दृश्यों पर आगे की सीट पर बैठे कुछ लोंग अपनी उत्तेजना काबू नहीं कर पाए और कामुकता का पाठ पढ़ाने लगे। शायद बाहुबली और बजरंगी भाईजान में इनके देखने लायक कुछ बाकी ना रह गया होगा तभी यहां आए होंगें, या फिर वो उसी संदर्भ में मसान देखने आए हैं जैसे में हम 15 साल पहले "फायर" और "बैंडिट क्वीन" देखने गए थे। खैर वजह जो भी हो, टिकट तो उन्होंने भी पैसे से ही लिया है।
कुछ देर बाद पिछे की सिटों से खुसफुसाहट आइ जो कुछ लड़के लड़कियों का एक ग्रुप था, कि "अरे ये तो दुर्गाकुंड है, अरे नहीं ये रामनगर है, हां हां।अरे नहीं यार ये तो रथयात्रा है" फिर क्या था ऐसे ही बनारस दर्शन करने में लग गए। पिज्जेरिया रेस्टोरेंट से लेकर घाटों तक सबकी व्याख्या कर दी गई। हद तो तब हो गई जब बात बनारस के सड़कों की दुर्दशा, लखनऊ विधानसभा से होते हुए दिल्ली संसद के रास्ते सीधे मोदी जी के सर पर गिरा। धड़ाम।
कुछ भोजपूरी भाषायी ज्ञानी पिक्चर में बोले जा रहे बनारसी भोजपूरी का शुद्धिकरण करने में लगे थे। "अरे मर्दवा, जात आड़ी नाहीं, जात हईई "।
आगे से भी लगातार तरह तरह के अभद्र व्याख्यान प्रस्तूत किये जा रहे थे। जो हल्के-फुल्के मुसकान बिखेरने वाले सीन पे भी ठहाके मारने पे विवश कर दे रहा था। इनकी हरकतों ने मुझे एक सवाल ने घेर लिया कि "ये मसान देखने क्यों आए हैं?" इन सब बातों से किसी तरह किनारा कर मैं मसान पे ध्यान केंद्रित कर रहा था।
मध्यांतर तक के लिए मेरे अंदर के दर्शक और विश्लेषक ने मसान को पांच में से पांच अंक दे दिया और एक अंक आगे पिछे बैठे अन्य दर्शकों को जो मेरे और "मसान" के बीच व्यवधान पैदा कर रहे थें। मध्यांतर में आपके मन में कई सवाल उठेंगे कि आखिर इंसपेक्टर से पहली बार ही पैसे मांगे जाने का विरोध क्यों ना हुआ? या फिर प्यार में जाती क्यों छुपाई और बताया भी तो इतना झुल्लाा के क्यों? अगर अपराधबोध था तो किस बात का अपनी जाती का या उस सत्य का जिसे वो झुठला रहा था? इत्यादि। ऐसे सवाल जिसके जवाब आपको कूरेदेंगे।
खैर मध्यांतर के बाद उस थिएटर में ऐसी परिस्थिति की परिकल्पना करना भी मुमकिन नहीं था। आगे के पंक्ति में बैठे चुटकुले बाज हों या पीछे की सीट पर बैठे व्याख्यानी जो अभी तक सिनेमा के हर पहलू से मजे निकाल के ला रहे थे, चाहे वो प्रेम प्रसंग हो या पिता-पुत्री का रिश्ता। सभी को शालू की मौत ने सांप सूंघ लिया, लगा हो मानो किसी अपने को हरिशचंद्र घाट पर फूंक कर आएं हों। अप्रत्याशित रूप से सभी दीपक के गम में भावविभोर हो गए।अभी इस गम से संभले ही थे कि विद्याधर पाठक और देवी ने सभी को बाप बेटी के रिश्ते में जकड़ लिया। इन दृश्यों ने शायद हर देखने वाले को किसी आप बिती को याद करने पे मजबूर किया होगा, तभी तो वो सभी शांत और सहज हो गए थे। वैसे इस पिक्चर में बहूत कुछ है देखने को, जो आप अगर देखने जाएंगे तो देख पाएँगे। मैने तो उतना भर ही लिखा जितना मुझे आगे की पंक्ति में बैठने वालों या पीछे वालों ने प्रेरित किया। वैसे तो सब मसान की ओर अग्रसर हैं ही।
भाईजान और बाहुबली अगर आपको सीटियां बजाने पर मजबूर करते हैं तो मसान आपको जिवन के फलसफा को समझने का मौका देता है, संयम और सहज बनाता है, जो उसने बखूबी किया।
मैंने भाईजान के लिए सिटियां नहीं बजाई पर मसान ने उन सिटीयों की गूंज को शांत कर दिया जो कभी भाईजान और बाहुबली के लिए बजी होंगी। टिकट खिड़की पर भाईजान और बाहुबली से हार कर भी जीत गया "मसान"।

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

मित्र अश्विनी से विवादों भरा संवाद!!!

प्रिय मित्र अश्विनी,
बेहद खुले मन और बेबाकी से आपको लिख रहा हूँ। आपको लिखने की वजह सिर्फ इतनी है कि आपसे विवादों पे संवाद बेहद सरल रूप में और अक्सर अप्रत्यक्ष रूप में होता है, ऐसे संवादों में न कोई जीत होती है न कोई हार और अक्सर ही समय के अभाव में ऐसे संवाद अधूरे ही रह जाते हैं।
फिर भी हर ज्वलंत मुद्दों पर हम एक दूसरे से भिड़ लेते हैं और अपने अंदर की आग को एक दूसरे के समक्ष रख देते हैं। ऐसी आग जो किसी विचारधार से ही प्रेरित होती हैं, इस बात से तो आप भी एक हद तक सहमत होंगे पर पता नहीं ये कहना कितना सही होगा कि आप दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रेरित हैं और मैं वामपंथी, पर फिर भी एक हद तक तो ऐसा है तो फिर हमारा टकराव होना लाज़मी है।
यूं तो आपसे होता यह वैचारिक और राजनितिक संवाद कद में हमारी मित्रता से बेहद छोटा है, पर फिर भी मैं चाहूंगा कि हम दोनों ही इन पहलुओं पर समानांतर रूप से चलते रहें और परिपक्व होने की कोशिश जारी रखें।
जैसा कि हर मंथन से कुछ ना कुछ सिखने को मिलता है, आपसे होने वालों संवाद भले ही अधूरे रहते हों पर मुझे हर ऐसा मौका न सिर्फ आपको और आपकी विचारधारा को जानने और समझने का नया अवसर प्रदान करता है बल्कि खुद को भी संयमित करने पर मजबूर करता है। यूं तो सोशल मिडिया पे प्रचारित कट्टर,हिंसक और संप्रदायिक मुद्दे जो शायद अभद्रता के प्रतीक थे, को ब्लाक करना मेरी अपनी सोच थी पर जब वो हमारी पूरानी मित्रता से टकराई तो हमें एक संयमित और भद्र मित्र को गरम दल के रूप में स्वीकार कर संवाद स्थापित करना उचित लगा,खासकर इस उद्देश्य से की शायद मैं आपको अपने नजरिए में ढ़ाल पाऊँ परंतु वैसा ना हो पाया, जो कि शायद सही है।

समाज में हर तरह के विचारों का होना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही जरूरी मुखरता से उनका विरोध होना भी है और विरोध को अस्वीकार कर सवाल करना उचित होगा परंतु भावनाओं के अधीन आकर दरकिनार करना या सवाल ना करना अनुचित।
बेबाकी और सहजता से होने वाले संवाद परस्पर अग्रसर होने चाहिए, जो सबको सिखने का मौका देता है। उम्मीद है कि आप हमें हमारे वैचारिक मतभेद और मित्रभाव को समांनतर रूप में बरकरार रखने में पूरा सहयोग करेंगे और संवादों में अवरोध स्वरूप आने वाले हर एक कारण को दरकिनार कर अपना विरोध और अस्वीकृति दर्ज कराते रहेंगे।

आपका मित्र और
धूर वैचारिक विरोधी
अभिषेक

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

दौरों में दौरा बनारस दौरा!!!

16 जुलाई 2015 आज ये तिसरा ऐसा मौका हुआ और पिछले 20 दिनों में दूसरा ऐसा मौका हुआ, जब मौसम ने प्रधानमंत्री मोदी जी को उनके संसदीय क्षेत्र के दौरे से नदारद कर दिया और कुछ बेहद महत्वपूर्ण समारोह होने से रह गए।वैसे तो दोनों ही मौकों पर दौरों के एक दिन पूर्व तक मौसम बेहद प्रतिकूल था।
महत्वपूर्ण समारोहों में से एक तो बी एच यू के ट्रॉमा सेंटर का उदघाटन था जो पिछले साल से ही देश के प्रधानमंत्री के इंतजार में तैयार खड़ा है। कुछ कारणों से ना तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आ सके और ना अब तक मोदी जी। अन्य समारोहों में रिंग रोड का शिलान्यास है, जिसका कार्य प्रगति पर है। इसके अलावा और भी कई घोषणाएँ होने से रह गए। पर सबसे महत्वपूर्ण थी मोदी जी की अपने संसदीय क्षेत्र में उपस्थिति और अपने वोटरों से रूबरू होना। वैसे तो पूरी तैयारी की गई थी, पिछली बार 28 जून को रद्द दौरे में जो कमियां थी उन्हें भी पूरी की गई मसलन रैली स्थल पर होने वाले जल जमाव को दुरुस्त करने के लिए पूरे पंडाल के फर्श की ईंटें की शोलिंग की गई। वाटरप्रूफ अल्यूम्यूनिम शिटों का टेंट तैयार किया गया। ये सब देख-सुन कर लगा कि शायद अच्छा ही हुआ कि मोदी जी का पिछला दौरा रद्द हो गया, कुछ नया देखने को मिला। वैसे तो ऐसे दौरों के रद्द होने से सरकारी खजाने पर चोट लगती है पर इससे आम जनता को कुछ लाभ तो हो ही जाता है। सड़कों पर महिनों पड़े रहे कुड़े को सफाई से लेकर सड़कों के मरम्मत सब धड़ल्ले से किए जाते हैं। कूड़े ढोने वाली गाड़ियों जो आम दिनों में नगर निगम के कार्यालयों की शोभा बढ़ाति हैं, मोदी जी के आगमन पर सड़कों पर दौड़ने लगती हैं, सड़के भी इन गाड़ियों का कुछ चंद दिनों के मेहमान की तरह ही स्वागत करती है।मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान से सफाई हो या ना हो, उनके दौरे के कार्यक्रम बनते ही सफाई अभियान जोरो से शुरू हो जाता है। कर्मठ प्रशासनिक महकमें की चहल पहल और तत्परता से बनारस भी हाई-फाई लगने लगता है और कोई आम बनारसी जो मोदी जी के आगमन की खबर से नदारद है ये सब देख कर अंदाजा लगा ही लेता है और पूछ लेता है "मोदी जी आवत् हऊअन का?"।
वैसे बनारसी खुले मिज़ाज़ के हैं, और मोदी जी को उसी खुले मिज़ाज़ से अपनाया है, और अब बारिश की वजह से रद्द होते दौरों पर अगर कोई बनारसी ये कह दे की "पता नाहीं गंगा माई मोदी जी के बुलइयनी की नाहीं पर इन्द्र देव जरूर मोदी जी के बनारस नाहीं आवल देवल चाहत हऊन" तो मोदी जी को भी उसे खुले मिज़ाज़ से लेना चाहिए।
दौरा रद्द होने से पहले अजय राय जी का एक ट्वीट आया कि कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई जो शायद प्रधानमंत्री के इस दौरे का विरोध कर रहें थे। खबर की कोई पुष्टि नहीं, पर ऐसा हुआ भी तो क्या? ऐसे विरोध से किसका क्या फायदा होता है? इससे बेहतर तो ये होता कि अजय राय जी अपने कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर सफाई करने ही उतर जाते और मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान की कलई उन्हीं के संसदीय क्षेत्र से खोलते।
वैसे मोदी जी का दौरा हो या रद्द हो जाए हम बनारसियों को फायदा तो होता ही है। मैं मोदी जी से मांग करता हूँ कि ऐसे रद्द दौरों का दौर जारी रहना चाहिए। बनारस ही क्यों देश के हर शहर को ऐसा सौभाग्य मिलना चाहिए।एक दिन या एक समय में कई दौरे प्रस्तावित हों और आखिरी समय में किसी एक जगह को तय किया जाए जिसका निर्णय मोदी जी खुद अपने विवेक से ले।

गुरुवार, 14 मई 2015

क्या चीन की तस्वीर बदलेगी?

देश की सीमाओं को लांघने का कभी सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ हमें। पर टीवी और अन्य माध्यमों से हर देश की अपनी एक छवी ने हमारे दिमाग में पैठ बना रखी है।पिछले साल भर से ये छवियां और भी गहरी होने लगी हैं, साथ ही कुछ यादें भी।
और उन यादों में हमारे प्रधानमंत्री जी ने भी अपनी एक जगह बना ली है। हाल के कई देशों के दौरों के बाद अब वो चीन में हैं।ना जाने क्यों, चीन का नाम सुनते ही एक विश्वासघाति छवी हमें झकझोर देती है।अपने अंदर का राष्ट्रवाद, युद्ध में मिली उस शिकस्त को कुछ उसी तरह दरकिनार करता है जैसे कि परीक्षा में किसी एक विषय में फेल हुए हों और उसके लिए अध्यापक साहब जिम्मेदार हों जिन्होंने सिलेबस के बाहर से कुछ पूछ दिया हो।
खैर ये तो पूरानी धुंधली तसवीर है जिसपे पड़े हुए धूल को मोदी जी साफ नहीं करना चाहेंगे बल्कि एक नई तसवीर जरूर दिखाना चाहेंगे। जिसका एक सबूत आज हमें देखने को मिला। लगा मानो मोदी जी, हिमालय की चोटियों को झुका कर पूरे देश से आग्रह कर रहे हों कि ये देखो यही है चीन, ये हमारा पड़ोसी है।

हालांकि हिंदुस्तानी मिडिया इस मौके की तैयारी पिछले कुछ दिनों से कर रही थी। टी वी पर चाइना दर्शन ऐसे करा रही थी मानों बुलेट ट्रेन टी वी से निकलकर अभी हमारे घर में गिरेगा, धड़ाम। जिस चाव से पत्रकार चाईना दर्शन कर एंव करा रहे है, लग रहा है कि हम चाईना वासी होने वालें हैं या फिर मोदी जी अब से चाईना का भी प्रतिनिधीतव करेंगे।
खैर उम्मीद करता हूं कि वहां से वापस आने के बाद मिडिया वाले बुलेट ट्रेन तो नही पर तुफान एक्सप्रेस की जेनरल बाँगी में दिल्ली से हावड़ा का सफर करेंगें और बताएंगे कि उन्होने कितना "SUFFER" किया। पर शायद इसकी उम्मीद करना ही बेकार है, वैसे कायदे से देखें तो ये काम विदेशी नेताओं के साथ आने वाले उस देश के मिडियावालों का है, कयों?  ये भी सही है,अब दुसरे देश की  मिडिया इतनी तेज तो है नहीं।
पर मैं इस बात की मांग करता हूं कि हमारी सरकार एक सर्कुलर लाए जिसमें विदेशी पत्रकारों को तुफान एक्सप्रेस की जनरल बोगी में सफर करना अत्यंत अनिवार्य किया जाए। टिकट काउंटर की लंबी लाइन के जद्दोजहद में नहीं पड़कर अगर वो बिना टिकट जाएं तो उनहें एक सहायक मुहैया कराया जाए जो उन्हें टी टी से बचने के सारे उपाय बता सके।
शायद ऐसी ही किसी कला का विदेशों में सम्मान किया जाए। वैसे सम्मान तो भारतीय रेल का विदेशों में होगा ही कि इतनी बड़ी संख्या में रोजगार जो मुहैया करा रही है।
इन सब के बीच देखने वाली बात ये है कि मोदी जी हमारे लिए चीन से कौन सी नयी तसवीर ले कर आते हैं?और वो उस पूरानी तसवीर से कितनी अलग होगी?

सोमवार, 11 मई 2015

भूला हुआ भूल गए..

अपनी जिंदगी जीना आता है हमें,
बस वो जमाना भूल गए।
"छूँ लू आसमां को" ख्वाब हमारे भी है,
हम तो बस सर उठाना भूल गए।


शर्मो  हया लाज से सरोकार रखती हैं निगाहें हमारी भी,
हम तो बस निगाहोँ को झुकाना भूल गए।


हंसते तो हम भी खूब हैं,
बस दूसरों को हसाना भूल गए।
रुलाते तो तुम भी थे बहुतों को,
हम तो बस चुप कराना भूल गए।
खुशियाँ तो हम भी बाँट लेते हैं,
पर छोटी-छोटी बांतो पे सताना भूल गए।
रातों की वो अठखेलियां याद हैं हमें,
पर अब तो जुगनू घर पे आना भूल गए।


अलविदा कहने हम भी जाते हैं, घर की दहलीज तक,
बस वो पक्की सड़क तक पहुंचाना भूल गए।


"इश्क एक आग का दरिया है" जानते है हम,
बस उस दरिया में डुबकी लगाना भूल गए।
ताज महल की खूबसूरती हमेँ भी है लुभाती,
वो भी है एक "इश्क का नजराना" भूल गए।


एहसास हमें भी है भूल जाने का,
समझ नहीं की क्या करें,
खुद को समझाना भूल गए।
शिकायत नहीं है ये,
पर शायद तुम हमें याद दिलाना भूल गए।

शनिवार, 9 मई 2015

रवीश जी के नाम !!

रवीश जी!आप पत्रकारिता में कब से हैं या टीवी पर आपको पहली बार मैंने कब देखा? इन जैसे सवालों से मैं कभी गुजरा नहीं हूं और चाहता भी नहीं हूं क्योंकि आपका व्यक्तित्व हमें इन सब सवालों के लिए कोई जगह ही नहीं देता है।लिखते हुए भी यही ख्याल दिल में बोझ बन रहा है कि शायद आपके नजर से ये गलत हो पर फिर जब आप सलमान भाई और राहुल गांधी को लिखे सकते हैं तो फिर मैं आपको क्यों नहीं? हां आप अपनी तुलना उनसे नहीं कर सकते और मैं भी अपनी तुलना आप से नहीं कर सकता। फिर भी एक दर्शक वाला रिश्ता तो बनता ही है। और खास कर तब जब कोई और कहीं आस पास भी न हो।
पता नहीं आपसे जुड़ना कैसे हुआ? ना तो आपका पहनावा पसंद आता है, ना ही आपका हेयर स्टाईल। कम से कम और पत्रकारों के मुकाबले में आप कहीं तो खड़े होते।पर नहीं आप तो यहां सिर्फ पत्रकारिता करने ही आए हैं।फिर तो हमने वही देखना शुरू किया,जब आपके दलीलों और बहसों को गौर से सूना और समझा तो लगा, अरे ये तो मैं हूं।
 पता नहीं आप मेरे अंदर थे या मैं आपके। आपका हर पक्ष के हर दलील को स्वीकार करके "फिर भी" कह कर अस्वीकार्य करना मानों सबकी दलीलों को सही और गलत के दोराहे पे ही रोक देता है। वहां से उनका रास्ता हम दर्शक खुद बनाने लगे।यही वो मौका होता है जब हम खुद में एक रवीश को देखने लगते हैं।
हां,कभी कभी जब इन सवालों से दिमाग का दही हो जाता, तो लगता कि अरे ये रवीश औरों की तरह फैसला सुनाकर क्यों नहीं जाता। फिर लगता कि नहीं, शायद आपका मकसद ही यही है कि हम उस दोराहे पे खुद ही फैसला करें कि किधर जाना है।आप भी ऐसे मौकों पर उलझें होंगे,फिर थोड़ा ठहर कर खुद को संयमित किया होगा। हम भी करेंगे। आपको सुन कर लगता था कि आप बहुत संयमी और धैर्यपूर्ण है, आपको गुस्से की समझ नहीं है,आप कैसे अपने अंदर के द्वेष को शांत रखते है, पर नहीं आपके वो तंज जो हल्की सी मुस्कान से शुरू होकर ठहाके तक जाता है, यही आपके उस नाराजगी का प्रदर्शन है।आपके बहसो  में ठहाकों और मुस्कानों ने अपनी उपयोगिता बनाए रखी है।
आपके ट्विटर और फेसबुकिया संदेशों को समझने में थोड़ा समय जरूर लगता है, पर शायद आप यही चाहते हों कि हम थोड़ा समय दें। इतना कुछ पसंदीदा होने के बाद भी आपका एक संदेश दिलोदिमाग को कचोटता है कि कितनी संजीदगी से आपने कह दिया की हमारे फैन न बनिये, मैं शत प्रतिशत सहमत हूं फिर भी शायद यही वो बात है जो मेरे अंदर एक लडाई का आह्वान किए हुए है।आपके व्यक्तित्व को समझने वाले हम जैसों का इस सवाल से कभी आमना सामना नहीं होता, पर जब आपने ये बात रख दी तो एक द्वंद चल रहा है भीतर ही,आपका मकसद चाहे कुछ भी हो पर हम आज तक इस सवाल के जवाब के तलाश में ही हैं। उम्मीद है कि आप ऐसी उलझनों को सुलझा कर ही हमें इसमें उलझा रहे हैं।