सोमवार, 27 जुलाई 2015

वो मसान देखने क्यों आए थे????

कल रविवार के दिन मसान देख पाना संभव न हुआ, कारण तो बहुत हुए पर मूलतः बाहुबली और भाईजान ही कारण थे जो टिकट खिड़की पे अब तक अपने प्रशंसकों से जद्दोजहद करवा रहे थे। उनकी अपार कमाई और प्रशंसकों के दिवानेपन के आगे "मसान" बेहद छोटा और ठुल्ला साबित हो रहा था।
भाईजान ने तो अखिलेश जी से मनोरंजन कर भी माफ करा ली और बाहुबली को ईनामस्वरूप मोदी जी से मुलाकात हो गई जिसकी तसवीरें आप तक पहुंच चुकी होंगी। और "मसान" के हाथों एक्का दुक्का कामयाबी ही लगी मसलन कांस फिल्म महोत्सव में फिप्रेस्की अवार्ड और कई लोगों ने लिखा कि अच्छी पिक्चर है,देख आइए। वैसे इन कामयाबियों का हवाला मेरे किसी भी मित्र गण को प्रेरित नहीं कर सका,और मैं भी हार कर अकेले ही निकल पड़ा कि चलूं देख आऊं कि अब जिंदगी के किस पहलू से अवगत होने का मौका मिले। हांलाकि आर्ट सिनेमा या रियलिस्टिक सिनेमा के नाम पर हमने "फायर" और "बैंडिट क्वीन" जैसी पिक्चर भी 15 साल पहले अपने स्कूली दिनों में मित्रों के साथ देखी है,पर एक अलग संदर्भ में, जिसका उल्लेख करना उचित नहीं है। पर धीरे धीरे ऐसे आर्ट और रियलिस्टिक सिनेमा ने अपनी सही जगह स्थापित कर ली है।
आज फिर खिड़की पर भीड़ देख कर हदस गया और लगा कि फिर गलती हो गई कि आनलाइन टिकट क्यों न बुक किया। खैर,भला हो उस सज्जन मानुष का जिसने मेरी भी टिकट ली और वो भी मेरे तरह ही अकेले आए थे यहां तक। थियेटर के अंदर पहूंच कर थोड़ी भीड़ देखी तो लगा कि चलिए कही तक तो ठेहरती है मसान, बाहुबली और भाईजान के आगे।
अपनी सीट पर पहुंच कर उन भाई साहब को धन्यवाद किया जिन्होंने टिकट लिया था और पिक्चर छुटने की जल्दबाज़ी में उस समय न कर पाया था। उनकी हल्की मुसकान ने भला मानषता की चिराग फोड़ दी। हमारी पंक्ति में बैठने वाले सभी अकेले ही आए थे। सब की अपनी अपनी मजबूरी रही होगी जरूरी नहीं की हम सभी का कारण एक ही हो।
खैर पिक्चर के पहले 15 मिनट में ही सबकुछ आम सिनेमा की तरह सामान्य हो गया जब देवी के उत्तेजक दृश्यों पर आगे की सीट पर बैठे कुछ लोंग अपनी उत्तेजना काबू नहीं कर पाए और कामुकता का पाठ पढ़ाने लगे। शायद बाहुबली और बजरंगी भाईजान में इनके देखने लायक कुछ बाकी ना रह गया होगा तभी यहां आए होंगें, या फिर वो उसी संदर्भ में मसान देखने आए हैं जैसे में हम 15 साल पहले "फायर" और "बैंडिट क्वीन" देखने गए थे। खैर वजह जो भी हो, टिकट तो उन्होंने भी पैसे से ही लिया है।
कुछ देर बाद पिछे की सिटों से खुसफुसाहट आइ जो कुछ लड़के लड़कियों का एक ग्रुप था, कि "अरे ये तो दुर्गाकुंड है, अरे नहीं ये रामनगर है, हां हां।अरे नहीं यार ये तो रथयात्रा है" फिर क्या था ऐसे ही बनारस दर्शन करने में लग गए। पिज्जेरिया रेस्टोरेंट से लेकर घाटों तक सबकी व्याख्या कर दी गई। हद तो तब हो गई जब बात बनारस के सड़कों की दुर्दशा, लखनऊ विधानसभा से होते हुए दिल्ली संसद के रास्ते सीधे मोदी जी के सर पर गिरा। धड़ाम।
कुछ भोजपूरी भाषायी ज्ञानी पिक्चर में बोले जा रहे बनारसी भोजपूरी का शुद्धिकरण करने में लगे थे। "अरे मर्दवा, जात आड़ी नाहीं, जात हईई "।
आगे से भी लगातार तरह तरह के अभद्र व्याख्यान प्रस्तूत किये जा रहे थे। जो हल्के-फुल्के मुसकान बिखेरने वाले सीन पे भी ठहाके मारने पे विवश कर दे रहा था। इनकी हरकतों ने मुझे एक सवाल ने घेर लिया कि "ये मसान देखने क्यों आए हैं?" इन सब बातों से किसी तरह किनारा कर मैं मसान पे ध्यान केंद्रित कर रहा था।
मध्यांतर तक के लिए मेरे अंदर के दर्शक और विश्लेषक ने मसान को पांच में से पांच अंक दे दिया और एक अंक आगे पिछे बैठे अन्य दर्शकों को जो मेरे और "मसान" के बीच व्यवधान पैदा कर रहे थें। मध्यांतर में आपके मन में कई सवाल उठेंगे कि आखिर इंसपेक्टर से पहली बार ही पैसे मांगे जाने का विरोध क्यों ना हुआ? या फिर प्यार में जाती क्यों छुपाई और बताया भी तो इतना झुल्लाा के क्यों? अगर अपराधबोध था तो किस बात का अपनी जाती का या उस सत्य का जिसे वो झुठला रहा था? इत्यादि। ऐसे सवाल जिसके जवाब आपको कूरेदेंगे।
खैर मध्यांतर के बाद उस थिएटर में ऐसी परिस्थिति की परिकल्पना करना भी मुमकिन नहीं था। आगे के पंक्ति में बैठे चुटकुले बाज हों या पीछे की सीट पर बैठे व्याख्यानी जो अभी तक सिनेमा के हर पहलू से मजे निकाल के ला रहे थे, चाहे वो प्रेम प्रसंग हो या पिता-पुत्री का रिश्ता। सभी को शालू की मौत ने सांप सूंघ लिया, लगा हो मानो किसी अपने को हरिशचंद्र घाट पर फूंक कर आएं हों। अप्रत्याशित रूप से सभी दीपक के गम में भावविभोर हो गए।अभी इस गम से संभले ही थे कि विद्याधर पाठक और देवी ने सभी को बाप बेटी के रिश्ते में जकड़ लिया। इन दृश्यों ने शायद हर देखने वाले को किसी आप बिती को याद करने पे मजबूर किया होगा, तभी तो वो सभी शांत और सहज हो गए थे। वैसे इस पिक्चर में बहूत कुछ है देखने को, जो आप अगर देखने जाएंगे तो देख पाएँगे। मैने तो उतना भर ही लिखा जितना मुझे आगे की पंक्ति में बैठने वालों या पीछे वालों ने प्रेरित किया। वैसे तो सब मसान की ओर अग्रसर हैं ही।
भाईजान और बाहुबली अगर आपको सीटियां बजाने पर मजबूर करते हैं तो मसान आपको जिवन के फलसफा को समझने का मौका देता है, संयम और सहज बनाता है, जो उसने बखूबी किया।
मैंने भाईजान के लिए सिटियां नहीं बजाई पर मसान ने उन सिटीयों की गूंज को शांत कर दिया जो कभी भाईजान और बाहुबली के लिए बजी होंगी। टिकट खिड़की पर भाईजान और बाहुबली से हार कर भी जीत गया "मसान"।

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