गुरुवार, 14 मई 2015

क्या चीन की तस्वीर बदलेगी?

देश की सीमाओं को लांघने का कभी सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ हमें। पर टीवी और अन्य माध्यमों से हर देश की अपनी एक छवी ने हमारे दिमाग में पैठ बना रखी है।पिछले साल भर से ये छवियां और भी गहरी होने लगी हैं, साथ ही कुछ यादें भी।
और उन यादों में हमारे प्रधानमंत्री जी ने भी अपनी एक जगह बना ली है। हाल के कई देशों के दौरों के बाद अब वो चीन में हैं।ना जाने क्यों, चीन का नाम सुनते ही एक विश्वासघाति छवी हमें झकझोर देती है।अपने अंदर का राष्ट्रवाद, युद्ध में मिली उस शिकस्त को कुछ उसी तरह दरकिनार करता है जैसे कि परीक्षा में किसी एक विषय में फेल हुए हों और उसके लिए अध्यापक साहब जिम्मेदार हों जिन्होंने सिलेबस के बाहर से कुछ पूछ दिया हो।
खैर ये तो पूरानी धुंधली तसवीर है जिसपे पड़े हुए धूल को मोदी जी साफ नहीं करना चाहेंगे बल्कि एक नई तसवीर जरूर दिखाना चाहेंगे। जिसका एक सबूत आज हमें देखने को मिला। लगा मानो मोदी जी, हिमालय की चोटियों को झुका कर पूरे देश से आग्रह कर रहे हों कि ये देखो यही है चीन, ये हमारा पड़ोसी है।

हालांकि हिंदुस्तानी मिडिया इस मौके की तैयारी पिछले कुछ दिनों से कर रही थी। टी वी पर चाइना दर्शन ऐसे करा रही थी मानों बुलेट ट्रेन टी वी से निकलकर अभी हमारे घर में गिरेगा, धड़ाम। जिस चाव से पत्रकार चाईना दर्शन कर एंव करा रहे है, लग रहा है कि हम चाईना वासी होने वालें हैं या फिर मोदी जी अब से चाईना का भी प्रतिनिधीतव करेंगे।
खैर उम्मीद करता हूं कि वहां से वापस आने के बाद मिडिया वाले बुलेट ट्रेन तो नही पर तुफान एक्सप्रेस की जेनरल बाँगी में दिल्ली से हावड़ा का सफर करेंगें और बताएंगे कि उन्होने कितना "SUFFER" किया। पर शायद इसकी उम्मीद करना ही बेकार है, वैसे कायदे से देखें तो ये काम विदेशी नेताओं के साथ आने वाले उस देश के मिडियावालों का है, कयों?  ये भी सही है,अब दुसरे देश की  मिडिया इतनी तेज तो है नहीं।
पर मैं इस बात की मांग करता हूं कि हमारी सरकार एक सर्कुलर लाए जिसमें विदेशी पत्रकारों को तुफान एक्सप्रेस की जनरल बोगी में सफर करना अत्यंत अनिवार्य किया जाए। टिकट काउंटर की लंबी लाइन के जद्दोजहद में नहीं पड़कर अगर वो बिना टिकट जाएं तो उनहें एक सहायक मुहैया कराया जाए जो उन्हें टी टी से बचने के सारे उपाय बता सके।
शायद ऐसी ही किसी कला का विदेशों में सम्मान किया जाए। वैसे सम्मान तो भारतीय रेल का विदेशों में होगा ही कि इतनी बड़ी संख्या में रोजगार जो मुहैया करा रही है।
इन सब के बीच देखने वाली बात ये है कि मोदी जी हमारे लिए चीन से कौन सी नयी तसवीर ले कर आते हैं?और वो उस पूरानी तसवीर से कितनी अलग होगी?

सोमवार, 11 मई 2015

भूला हुआ भूल गए..

अपनी जिंदगी जीना आता है हमें,
बस वो जमाना भूल गए।
"छूँ लू आसमां को" ख्वाब हमारे भी है,
हम तो बस सर उठाना भूल गए।


शर्मो  हया लाज से सरोकार रखती हैं निगाहें हमारी भी,
हम तो बस निगाहोँ को झुकाना भूल गए।


हंसते तो हम भी खूब हैं,
बस दूसरों को हसाना भूल गए।
रुलाते तो तुम भी थे बहुतों को,
हम तो बस चुप कराना भूल गए।
खुशियाँ तो हम भी बाँट लेते हैं,
पर छोटी-छोटी बांतो पे सताना भूल गए।
रातों की वो अठखेलियां याद हैं हमें,
पर अब तो जुगनू घर पे आना भूल गए।


अलविदा कहने हम भी जाते हैं, घर की दहलीज तक,
बस वो पक्की सड़क तक पहुंचाना भूल गए।


"इश्क एक आग का दरिया है" जानते है हम,
बस उस दरिया में डुबकी लगाना भूल गए।
ताज महल की खूबसूरती हमेँ भी है लुभाती,
वो भी है एक "इश्क का नजराना" भूल गए।


एहसास हमें भी है भूल जाने का,
समझ नहीं की क्या करें,
खुद को समझाना भूल गए।
शिकायत नहीं है ये,
पर शायद तुम हमें याद दिलाना भूल गए।

शनिवार, 9 मई 2015

रवीश जी के नाम !!

रवीश जी!आप पत्रकारिता में कब से हैं या टीवी पर आपको पहली बार मैंने कब देखा? इन जैसे सवालों से मैं कभी गुजरा नहीं हूं और चाहता भी नहीं हूं क्योंकि आपका व्यक्तित्व हमें इन सब सवालों के लिए कोई जगह ही नहीं देता है।लिखते हुए भी यही ख्याल दिल में बोझ बन रहा है कि शायद आपके नजर से ये गलत हो पर फिर जब आप सलमान भाई और राहुल गांधी को लिखे सकते हैं तो फिर मैं आपको क्यों नहीं? हां आप अपनी तुलना उनसे नहीं कर सकते और मैं भी अपनी तुलना आप से नहीं कर सकता। फिर भी एक दर्शक वाला रिश्ता तो बनता ही है। और खास कर तब जब कोई और कहीं आस पास भी न हो।
पता नहीं आपसे जुड़ना कैसे हुआ? ना तो आपका पहनावा पसंद आता है, ना ही आपका हेयर स्टाईल। कम से कम और पत्रकारों के मुकाबले में आप कहीं तो खड़े होते।पर नहीं आप तो यहां सिर्फ पत्रकारिता करने ही आए हैं।फिर तो हमने वही देखना शुरू किया,जब आपके दलीलों और बहसों को गौर से सूना और समझा तो लगा, अरे ये तो मैं हूं।
 पता नहीं आप मेरे अंदर थे या मैं आपके। आपका हर पक्ष के हर दलील को स्वीकार करके "फिर भी" कह कर अस्वीकार्य करना मानों सबकी दलीलों को सही और गलत के दोराहे पे ही रोक देता है। वहां से उनका रास्ता हम दर्शक खुद बनाने लगे।यही वो मौका होता है जब हम खुद में एक रवीश को देखने लगते हैं।
हां,कभी कभी जब इन सवालों से दिमाग का दही हो जाता, तो लगता कि अरे ये रवीश औरों की तरह फैसला सुनाकर क्यों नहीं जाता। फिर लगता कि नहीं, शायद आपका मकसद ही यही है कि हम उस दोराहे पे खुद ही फैसला करें कि किधर जाना है।आप भी ऐसे मौकों पर उलझें होंगे,फिर थोड़ा ठहर कर खुद को संयमित किया होगा। हम भी करेंगे। आपको सुन कर लगता था कि आप बहुत संयमी और धैर्यपूर्ण है, आपको गुस्से की समझ नहीं है,आप कैसे अपने अंदर के द्वेष को शांत रखते है, पर नहीं आपके वो तंज जो हल्की सी मुस्कान से शुरू होकर ठहाके तक जाता है, यही आपके उस नाराजगी का प्रदर्शन है।आपके बहसो  में ठहाकों और मुस्कानों ने अपनी उपयोगिता बनाए रखी है।
आपके ट्विटर और फेसबुकिया संदेशों को समझने में थोड़ा समय जरूर लगता है, पर शायद आप यही चाहते हों कि हम थोड़ा समय दें। इतना कुछ पसंदीदा होने के बाद भी आपका एक संदेश दिलोदिमाग को कचोटता है कि कितनी संजीदगी से आपने कह दिया की हमारे फैन न बनिये, मैं शत प्रतिशत सहमत हूं फिर भी शायद यही वो बात है जो मेरे अंदर एक लडाई का आह्वान किए हुए है।आपके व्यक्तित्व को समझने वाले हम जैसों का इस सवाल से कभी आमना सामना नहीं होता, पर जब आपने ये बात रख दी तो एक द्वंद चल रहा है भीतर ही,आपका मकसद चाहे कुछ भी हो पर हम आज तक इस सवाल के जवाब के तलाश में ही हैं। उम्मीद है कि आप ऐसी उलझनों को सुलझा कर ही हमें इसमें उलझा रहे हैं।