कुछ महीनों पहले तक "मांझी" नाम बिहार की राजनीति में तुफान मचाने वाला व्यक्तित्व का था। परंतु आज "मांझी" इतिहास के गर्भ से आपार प्रेरणाश्रोत के रूप में उभरे स्वर्गीय दशरथ मांझी के संदर्भ में लिया जा रहा है जो अपने अद्भुत कारनामें के लिए आज लगभग 20 सालों के बाद देश से सिनेमा के माध्यम से रूबरू हो रहे है,या यूं कहें कि देश उनसे रूबरू हो रहा है। हालांकि यदा कदा उनकी ये कारनामों वाली पोथी अखबारों में खुलती रही होगी, पर शायद हमलोगों ने उसे नजरअंदाज कर दिया होगा।
जब ये पूरी कहानी रूपहले पर्दे पर आइ है तो शायद अब हमलोगों ने गुगलिया ग्यानवर्धन शुरू किया और "मांझी" और उनके और एक पहाड़ के बीच की 20 सालों तक चली लंबी लड़ाई की व्याख्या कर रहे हैं। खैर जो प्रेरणादायी है उस कारनामें को जरूर मौका मिलना चाहिए कि वो लोंगों को प्रोत्साहित कर सके। परंतु अगर आपको ऐसी घटनाएं प्रेरित करती हैं और आप उस गुगलिया ग्यान को प्रेरणा का स्वरूप देना चाहते हैं और "मांझी" की इस कहानी के रूपहले पर्दे के अवतार को सिर्फ इसलिए नहीं देखना चाहते क्योंकि कहानी का सार आपने समझ लिया है तो मेरा यकीन मानिए आप इसे देखने जरूर जाइए।
इसमें आपके देखने के लिए बहुत कुछ है। हमारे लिए ये एक प्रेरणादायी कहानी से बढ़कर है, हमारे समाजिक तानेबाने कि वो कमियां जिसकी पृष्ठभूमि से ही "मांझी" की कहानी शुरू होती है, उसको बेहद खुलेपन से और शायद उस समय के सत्य के हिसाब से दिखाया गया है।50-60 के दशक में होते छूत-अछूत और दलित शोषण,जमींदारी जैसे सामाजिक दोष को आईना दिखाती है यह सिनेमा, गांव के मुखिया और सरकारी महकमें की सांठगांठ से होते भ्रष्टाचार को बहुत नजदीक से छू गई है। नक्सलवाद के जन्म और उसकी सोच को भी छोटे से अंश में ही सही पर बखूबी दर्शाया गया है।दशरथ मांझी की अपनी कहानी के साथ ही साथ चलने वाली ये समाजिक उतार-चढ़ाव की कहानी बहुत कुछ बयां करती है। एक नवयुवक का बुढ़े दशरथ से ये कहना की "आप तो बहुत बड़ा काम कर रहे हैं, हम तो बचपन में आपको पगला पहाड़तोड़वा बाबा कहते थे और पत्थर मारते थे" या फिर शुरूआती दौर में उसके इस जूनून को नकारत्मक दृष्टि से देखने वाले लोंगों की ख्यालाती बदलाव इस बात के सबूत थे कि हम सामाजिक रूप से परस्पर परिपक्व होते रहे थे।हाल के दिनों में एक साथ एक पर्दे पर इतना कुछ देखने को नहीं मिला जो हमें सामाजिक रूप से खुद में झांकने के लिए मजबूर करें।
हम कुछ दृश्यों पर ओह!! आह!! कर सकते हैं। पर इस बात को भी मानना पड़ेगा कि हमारी संवेदना इन सिनेमा घरों तर ही सीमित रह सकती है अगर हम उन दृश्यों को काल्पनिक मानें, जो की है नहीं, या फिर आज के परिवेश में ऐसी घटनाओं को नगण्य मान ले। खैर सच्चाई यही है कि यह कहानी किसी दशरथ मांझी की अपनी लड़ाई से बहुत ज्यादा दिखाती है, बशर्ते हम उसे देखने के लिए तैयार हों। ये बिहार के गया जिले का गेहलोर गांव की कहानी ही नहीं है ये हिंदुस्तान के हर गांव की कहानी है जो 50-60 साल तक खुद तक पहुंचने वाले सड़क और मूल-भूत सुविधाओं की ताक में था और अब भी है। बस गेहलोर की कहानी अलग इसलिए है कि वहां दशरथ मांझी ने अकेले के दम पर पहाड़ तोड़ कर रास्ता बना डाला। आज दशरथ मांझी के इस कारनामें को रूपहले पर्दे पर देख कर हम गर्व कर सकते या फिर कुछ सवालों के जवाब ढ़ूंढ़ने की कोशिश करें कि क्या आज भी सारे मांझी उसी तरह से जी रहे हैं, जैसा कुछ कुछ पर्दे पर देखने को मिल रहा है या फिर वाकई हर मांझी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकता है?




