प्रिय मित्र अश्विनी,
बेहद खुले मन और बेबाकी से आपको लिख रहा हूँ। आपको लिखने की वजह सिर्फ इतनी है कि आपसे विवादों पे संवाद बेहद सरल रूप में और अक्सर अप्रत्यक्ष रूप में होता है, ऐसे संवादों में न कोई जीत होती है न कोई हार और अक्सर ही समय के अभाव में ऐसे संवाद अधूरे ही रह जाते हैं।
फिर भी हर ज्वलंत मुद्दों पर हम एक दूसरे से भिड़ लेते हैं और अपने अंदर की आग को एक दूसरे के समक्ष रख देते हैं। ऐसी आग जो किसी विचारधार से ही प्रेरित होती हैं, इस बात से तो आप भी एक हद तक सहमत होंगे पर पता नहीं ये कहना कितना सही होगा कि आप दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रेरित हैं और मैं वामपंथी, पर फिर भी एक हद तक तो ऐसा है तो फिर हमारा टकराव होना लाज़मी है।
यूं तो आपसे होता यह वैचारिक और राजनितिक संवाद कद में हमारी मित्रता से बेहद छोटा है, पर फिर भी मैं चाहूंगा कि हम दोनों ही इन पहलुओं पर समानांतर रूप से चलते रहें और परिपक्व होने की कोशिश जारी रखें।
जैसा कि हर मंथन से कुछ ना कुछ सिखने को मिलता है, आपसे होने वालों संवाद भले ही अधूरे रहते हों पर मुझे हर ऐसा मौका न सिर्फ आपको और आपकी विचारधारा को जानने और समझने का नया अवसर प्रदान करता है बल्कि खुद को भी संयमित करने पर मजबूर करता है। यूं तो सोशल मिडिया पे प्रचारित कट्टर,हिंसक और संप्रदायिक मुद्दे जो शायद अभद्रता के प्रतीक थे, को ब्लाक करना मेरी अपनी सोच थी पर जब वो हमारी पूरानी मित्रता से टकराई तो हमें एक संयमित और भद्र मित्र को गरम दल के रूप में स्वीकार कर संवाद स्थापित करना उचित लगा,खासकर इस उद्देश्य से की शायद मैं आपको अपने नजरिए में ढ़ाल पाऊँ परंतु वैसा ना हो पाया, जो कि शायद सही है।
समाज में हर तरह के विचारों का होना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही जरूरी मुखरता से उनका विरोध होना भी है और विरोध को अस्वीकार कर सवाल करना उचित होगा परंतु भावनाओं के अधीन आकर दरकिनार करना या सवाल ना करना अनुचित।
बेबाकी और सहजता से होने वाले संवाद परस्पर अग्रसर होने चाहिए, जो सबको सिखने का मौका देता है। उम्मीद है कि आप हमें हमारे वैचारिक मतभेद और मित्रभाव को समांनतर रूप में बरकरार रखने में पूरा सहयोग करेंगे और संवादों में अवरोध स्वरूप आने वाले हर एक कारण को दरकिनार कर अपना विरोध और अस्वीकृति दर्ज कराते रहेंगे।
आपका मित्र और
धूर वैचारिक विरोधी
अभिषेक
बेहद खुले मन और बेबाकी से आपको लिख रहा हूँ। आपको लिखने की वजह सिर्फ इतनी है कि आपसे विवादों पे संवाद बेहद सरल रूप में और अक्सर अप्रत्यक्ष रूप में होता है, ऐसे संवादों में न कोई जीत होती है न कोई हार और अक्सर ही समय के अभाव में ऐसे संवाद अधूरे ही रह जाते हैं।
फिर भी हर ज्वलंत मुद्दों पर हम एक दूसरे से भिड़ लेते हैं और अपने अंदर की आग को एक दूसरे के समक्ष रख देते हैं। ऐसी आग जो किसी विचारधार से ही प्रेरित होती हैं, इस बात से तो आप भी एक हद तक सहमत होंगे पर पता नहीं ये कहना कितना सही होगा कि आप दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रेरित हैं और मैं वामपंथी, पर फिर भी एक हद तक तो ऐसा है तो फिर हमारा टकराव होना लाज़मी है।
यूं तो आपसे होता यह वैचारिक और राजनितिक संवाद कद में हमारी मित्रता से बेहद छोटा है, पर फिर भी मैं चाहूंगा कि हम दोनों ही इन पहलुओं पर समानांतर रूप से चलते रहें और परिपक्व होने की कोशिश जारी रखें।
जैसा कि हर मंथन से कुछ ना कुछ सिखने को मिलता है, आपसे होने वालों संवाद भले ही अधूरे रहते हों पर मुझे हर ऐसा मौका न सिर्फ आपको और आपकी विचारधारा को जानने और समझने का नया अवसर प्रदान करता है बल्कि खुद को भी संयमित करने पर मजबूर करता है। यूं तो सोशल मिडिया पे प्रचारित कट्टर,हिंसक और संप्रदायिक मुद्दे जो शायद अभद्रता के प्रतीक थे, को ब्लाक करना मेरी अपनी सोच थी पर जब वो हमारी पूरानी मित्रता से टकराई तो हमें एक संयमित और भद्र मित्र को गरम दल के रूप में स्वीकार कर संवाद स्थापित करना उचित लगा,खासकर इस उद्देश्य से की शायद मैं आपको अपने नजरिए में ढ़ाल पाऊँ परंतु वैसा ना हो पाया, जो कि शायद सही है।
समाज में हर तरह के विचारों का होना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही जरूरी मुखरता से उनका विरोध होना भी है और विरोध को अस्वीकार कर सवाल करना उचित होगा परंतु भावनाओं के अधीन आकर दरकिनार करना या सवाल ना करना अनुचित।
बेबाकी और सहजता से होने वाले संवाद परस्पर अग्रसर होने चाहिए, जो सबको सिखने का मौका देता है। उम्मीद है कि आप हमें हमारे वैचारिक मतभेद और मित्रभाव को समांनतर रूप में बरकरार रखने में पूरा सहयोग करेंगे और संवादों में अवरोध स्वरूप आने वाले हर एक कारण को दरकिनार कर अपना विरोध और अस्वीकृति दर्ज कराते रहेंगे।
आपका मित्र और
धूर वैचारिक विरोधी
अभिषेक
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