शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

मांझी कहां है???


कुछ महीनों पहले तक "मांझी" नाम बिहार की राजनीति में तुफान मचाने वाला व्यक्तित्व का था। परंतु आज "मांझी" इतिहास के गर्भ से आपार प्रेरणाश्रोत के रूप में उभरे स्वर्गीय दशरथ मांझी के संदर्भ में लिया जा रहा है जो अपने अद्भुत कारनामें के लिए आज लगभग 20 सालों के बाद देश से सिनेमा के माध्यम से रूबरू हो रहे है,या यूं कहें कि देश उनसे रूबरू हो रहा है। हालांकि यदा कदा उनकी ये कारनामों वाली पोथी अखबारों में खुलती रही होगी, पर शायद हमलोगों ने उसे नजरअंदाज कर दिया होगा।
जब ये पूरी कहानी रूपहले पर्दे पर आइ है तो शायद अब हमलोगों ने गुगलिया ग्यानवर्धन शुरू किया और "मांझी" और उनके और एक पहाड़ के बीच की 20 सालों तक चली लंबी लड़ाई की व्याख्या कर रहे हैं। खैर जो प्रेरणादायी है उस कारनामें को जरूर मौका मिलना चाहिए कि वो लोंगों को प्रोत्साहित कर सके। परंतु अगर आपको ऐसी घटनाएं प्रेरित करती हैं और आप उस गुगलिया ग्यान को प्रेरणा का स्वरूप देना चाहते हैं और "मांझी" की इस कहानी के रूपहले पर्दे के अवतार को सिर्फ इसलिए नहीं देखना चाहते क्योंकि कहानी का सार आपने समझ लिया है तो मेरा यकीन मानिए आप इसे देखने जरूर जाइए।
इसमें आपके देखने के लिए बहुत कुछ है। हमारे लिए ये एक प्रेरणादायी कहानी से बढ़कर है, हमारे समाजिक तानेबाने कि वो कमियां जिसकी पृष्ठभूमि से ही "मांझी" की कहानी शुरू होती है, उसको बेहद खुलेपन से और शायद उस समय के सत्य के हिसाब से दिखाया गया है।50-60 के दशक में होते छूत-अछूत और दलित शोषण,जमींदारी जैसे सामाजिक दोष को आईना दिखाती है यह सिनेमा, गांव के मुखिया और सरकारी महकमें की सांठगांठ से होते भ्रष्टाचार को बहुत नजदीक से छू गई है। नक्सलवाद के जन्म और उसकी सोच को भी छोटे से अंश में ही सही पर बखूबी दर्शाया गया है।दशरथ मांझी की अपनी कहानी के साथ ही साथ चलने वाली ये समाजिक उतार-चढ़ाव की कहानी बहुत कुछ बयां करती है। एक नवयुवक का बुढ़े दशरथ से ये कहना की "आप तो बहुत बड़ा काम कर रहे हैं, हम तो बचपन में आपको पगला पहाड़तोड़वा बाबा कहते थे और पत्थर मारते थे" या फिर शुरूआती दौर में उसके इस जूनून को नकारत्मक दृष्टि से देखने वाले लोंगों की ख्यालाती बदलाव इस बात के सबूत थे कि हम सामाजिक रूप से परस्पर परिपक्व होते रहे थे।हाल के दिनों में एक साथ एक पर्दे पर इतना कुछ देखने को नहीं मिला जो हमें सामाजिक रूप से खुद में झांकने के लिए मजबूर करें।
हम कुछ दृश्यों पर ओह!! आह!!  कर सकते हैं। पर इस बात को भी मानना पड़ेगा कि हमारी संवेदना इन सिनेमा घरों तर ही सीमित रह सकती है अगर हम उन दृश्यों को काल्पनिक मानें, जो की है नहीं,  या फिर आज के परिवेश में ऐसी घटनाओं को नगण्य मान ले। खैर सच्चाई यही है कि यह कहानी किसी दशरथ मांझी की अपनी लड़ाई से बहुत ज्यादा दिखाती है, बशर्ते हम उसे देखने के लिए तैयार हों। ये बिहार के गया जिले का गेहलोर गांव की कहानी ही नहीं है ये हिंदुस्तान के हर गांव की कहानी है जो 50-60 साल तक खुद तक पहुंचने वाले सड़क और मूल-भूत सुविधाओं की ताक में था और अब भी है। बस गेहलोर की कहानी अलग इसलिए है कि वहां दशरथ मांझी ने अकेले के दम पर पहाड़ तोड़ कर रास्ता बना डाला। आज दशरथ मांझी के इस कारनामें को रूपहले पर्दे पर देख कर हम गर्व कर सकते या फिर कुछ सवालों के जवाब ढ़ूंढ़ने की कोशिश करें कि क्या आज भी सारे मांझी उसी तरह से जी रहे हैं, जैसा कुछ कुछ पर्दे पर देखने को मिल रहा है या फिर वाकई हर मांझी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सकता है?

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

देवालयों का होता अनादर!!!!

हम एक ऐसे राजतंत्र की जनता है जिसने प्रजातंत्र का मुखौटा चढ़ाए हुए है। जहां राजा प्रबल होता है, और उसकी वाणी पत्थर की लकीर। उदाहरण के तौर पर "पहले शौचालय फिर देवालय" ऐसा कह कर जहां हमारे सेनापति श्री जायराम रमेश ने हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाई तो यही बात हमारे तत्कालिक मनोनीत प्रधानमंत्री जी के कहे से हमारी जरूरत बन गई।दम तोड़ते हुए प्रजातंत्र की ऐसी कई मिसालें आपको मिल सकती हैं।
खैर जैसे मानव जाती का विस्तार ही मानव होने का मूल उद्देश्य है। उसी प्रकार हर धर्मावलंबी अपने धर्म का विस्तार की जुगत में लगा रहता है, ऐसे में हर राजा के उपर भी अपने धर्मावलंबियों का दबाव बना रहता है। हाल ही में खाड़ी देशों के दौरे से लौटे हमारे प्रधानमंत्री जी हम हिंदु देशवासियों के लिए कुछ ऐसे ही धर्म विस्तार की सौगात लेकर आए। शारजाह का वो स्टेडियम जो भारत में उस खेल से जाना जाता था जो देश की धार्मिक अस्मिता में घुसपैठ कर रहा था, ऐसी घुसपैठ जिसमें कि इस खेल को धर्म के समकक्ष लाकर खड़ा करने वाले वो योद्धा खुद को देवालयों में स्थापित करना चाह रहे थे।हमारे प्रधानमंत्री जी ने इस खेल की मंशा को, जिसे पूरा करने के लिए सचिन तेंदुलकर और  महेंद्र सिंह धोनी जैसे सेनापति तत्पर थे, शारजाह में उन्हीं के घर में इस बात का ऐलान करते हुए धराशायी कर दिया कि आबु-धाबी की सरकार ने उन्हें मंदिर के लिए जमीन देने का वायदा किया है। और ऐसा ऐलान करते हुए उन्होंने उन सभी श्रोताओं/दर्शकों को वहां के शेख़ साहब के सम्मान में खड़ा करा दिया जो अब तक सचिन के छक्कों से उत्तेजित होकर खड़े होते थे। अगर इसे पढते हुए आपको सचिन तेंदुलकर का वो दृश्य याद आ जाए  जिसमें वो एक योद्धा की तरह अकेले ही अस्ट्रेलिया की सेना से लोहा ले रहे हैं और आंधी तुफान के बावजूद रणभूमि में डटे हुए हैं तो इस बात को मान लीजिए कि आप धार्मिक रूप से उस घुसपैठ के शिकार हो चुके थे जिसके लिए सेनापति सचिन तेंदुलकर तत्पर थे।
बहरहाल मोदी जी का ये ऐलान देश को और खास कर हिंदू धर्म को गौरवान्वित होने से ज्यादा अपने गौरव के प्रचार और प्रसार का मौका देता है। मैं ऐसा कहते हुए गुगल के हवाले से निकले 9 जुलाई 2013 की टाइम्स आफ इंडिया की उस खबर को अमान्य करता हूं जिसमें लिखा है कि एक अरब व्यापारी ने एक हिंदू संस्था को मंदिर बनाने के लिए जमीन देने का ऐलान किया है। खैर, ये गुगलिया दोष है, जो बहुत हद तक वो नाड़ी दोष है जिसके होने पर आपको वैवाहिक संबंधों को निभाने पर सवालिया निशाना खड़ा करता है। ऐसे काल्पनिक दोषों का या तो पूर्ण रूप से विरोध करें या फिर समर्थन, तभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।
शायद ही कोई आस्तिक हिंदू हो जो इस ऐलान से गौरवान्वित ना हुआ हो, और अपने गौरव का प्रदर्शन ना किया हो। मैं उन निराशावादी लोगों की बात नहीं कर रहा जिनकी पहचान मोदी जी ने अपने 15 अगस्त के राष्ट्रसंबोधन में टोका-टिप्पणी करने वालों के रूप में कराई थी जो बेवजह ही व्याख्या करने बैठ जाते हैं। ये वो लोग हैं जो मोदी जी की इस महान कीर्ति को अबू-धाबी के लोगों की भलमनसाहत की पहचान बता रहे है और मोदी जी को ही नसीहत दे रहें हैं कि उनसे कुछ सीखें। पता नहीं ऐसे लोग किस बात पर मोदी जी की तारीफ करेंगे, नसीहत देने वाले ये क्यों नहीं देख रहे कि आखिर मोदी जी भी वहां मसजिद में गए थे, जिससे हमारे देश के मुसलमान भाई भी गौरवान्वित हुए। अगर ऐसे ही कर्मठता से मोदी जी डटे रहे तो यकीन मानिए वो मंदिर वालों को मस्जिदों तक और मस्जिद वालों को मंदिर तक लाने कामयाब हो जाएंगे । बशर्ते ये निराशावादी लोग तिल का ताड़ बनाना छोड़ दें।
वैसे तो सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में शौचालयों की कमी है, जिसे लगातार पूरा किया जा रहा है। परंतु ऐसा कोई आँकड़ा नहीं है जो ये बताए कि देश में कितने देवालयों की जरूरत है और कितने इस वक्त हैं। सच्चाई तो ये है कि आबु-धाबी में बनने वाली देवालय में वहां की सरकार की हामी का बड़ा महत्व है, वहां सरकार तय करेगी कि देवालय कहां बनेगा, और इस बात का ख्याल रखा जाएगा कि उससे मानवीय मूल-भूत सुविधाओं को कोई क्षति तो नहीं पहुंचेगी, इसके ठीक विपरीत भारत में देवालयों का निर्माण देवों के अपनी मर्जी पर है, जो कहीं भी प्रकट हो सकते है और फिर उनका उसी स्थान पर स्थापित होना हमारे लिए धार्मिक जिम्मेदारी है, जो हमारी अपनी मूल-भूत सुविधाओं या कहें कि विकास से ज्यादा जरूरी है। उदाहरणार्थ आप अपने शहर के सड़कों पर घूम लें तमाम ऐसे दृश्य मिलेंगे जहां हमारी आस्था हमारे मूल-भूत सुविधाओं से टकराती मिलेंगी। अपने शहर बनारस की कुछ तस्वीरें साझा कर रहा हूं, जिसे देखकर लगता है कि कैसे विकास के नाम पे हम अपनी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा रहें हैं।
बी. एच. यू अस्पताल के सामने पीपल देव का अनादर। 

भगवान् शिव की मंदिर के दोनों तरफ से जाती ये सड़क। 




पद्मश्री चौराहे पर अपने अस्तित्व के लिए लड़ती शितला मात


पद्मश्री चौराहे पर ही विराजित
हनुमान जी।

 मैं मांग करता हूं भारत सरकार से कि ऐसे देवालयों को आंकलन हो और उन सुविधाओं को,जो विकास के नाम पे हमारी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाती हैं,जड़ से उखाड़ फेंका जाए।पर शायद सरकार से उम्मीद करना अतिरेक हो, फिर भी मैं खुद को निराशावादी नहीं मानता। मैं उस प्रजातंत्र का हिस्सा हूं जहां इस मामले में मेरी सारी आशा अपने राजा बाहुबली से है जो सुविधानुसार इन देवालयों को अपने कंधे पर रख कर विस्थापित कर सके जैसे उसने अपनी मां की सुविधा के लिए शिवलिंग को अपने कंधों पर रख कर गंगा मैया के गोद में स्थापित कर दिया था। बहरहाल आप अपने घरों के दिवारों पे लगे पीपल के पेड़ों को जल अर्पित करते रहें। क्योंकि सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं कि वो हमारे लिए पीपल के बाग लगाए। विकास के नारों के बीच हमारी धार्मिक अस्मिता फिर से खतरे में तो नहीं ना आ जाएगी? कहीं क्रिकेट के बाद विकास का ये नारा हमारी धार्मिक विश्वासों में घुसपैठ तो नहीं कर रही है? अगर हां तो फिर इस विकास के सेनापति कौन और कहां हैं?