रवीश जी!आप पत्रकारिता में कब से हैं या टीवी पर आपको पहली बार मैंने कब
देखा? इन जैसे सवालों से मैं कभी गुजरा नहीं हूं और चाहता भी नहीं हूं
क्योंकि आपका व्यक्तित्व हमें इन सब सवालों के लिए कोई जगह ही नहीं
देता
है।लिखते हुए भी यही ख्याल दिल में बोझ बन रहा है कि शायद आपके नजर से ये
गलत हो पर फिर जब आप सलमान भाई और राहुल गांधी को लिखे सकते हैं तो फिर
मैं आपको क्यों नहीं? हां आप अपनी तुलना उनसे नहीं कर सकते और मैं भी अपनी तुलना आप से नहीं कर सकता। फिर भी एक दर्शक वाला रिश्ता तो बनता ही
है। और खास कर तब जब कोई और कहीं आस पास भी न हो।पता नहीं आपसे जुड़ना कैसे हुआ? ना तो आपका पहनावा पसंद आता है, ना ही आपका हेयर स्टाईल। कम से कम और पत्रकारों के मुकाबले में आप कहीं तो खड़े होते।पर नहीं आप तो यहां सिर्फ पत्रकारिता करने ही आए हैं।फिर तो हमने वही देखना शुरू किया,जब आपके दलीलों और बहसों को गौर से सूना और समझा तो लगा, अरे ये तो मैं हूं।
पता नहीं आप मेरे अंदर थे या मैं आपके। आपका हर पक्ष के हर दलील को स्वीकार करके "फिर भी" कह कर अस्वीकार्य करना मानों सबकी दलीलों को सही और गलत के दोराहे पे ही रोक देता है। वहां से उनका रास्ता हम दर्शक खुद बनाने लगे।यही वो मौका होता है जब हम खुद में एक रवीश को देखने लगते हैं।
हां,कभी कभी जब
इन सवालों से दिमाग का दही हो जाता, तो लगता कि अरे ये रवीश औरों की तरह
फैसला सुनाकर क्यों नहीं जाता। फिर लगता कि नहीं, शायद आपका मकसद ही यही है
कि हम उस दोराहे पे खुद ही फैसला करें कि किधर जाना है।आप भी ऐसे मौकों पर
उलझें होंगे,फिर थोड़ा ठहर कर खुद को संयमित किया होगा। हम भी करेंगे। आपको
सुन कर लगता था कि आप बहुत संयमी और धैर्यपूर्ण है, आपको गुस्से की समझ
नहीं है,आप कैसे अपने अंदर के द्वेष को शांत रखते है, पर नहीं आपके वो तंज
जो हल्की सी मुस्कान से शुरू होकर ठहाके तक जाता है, यही आपके उस नाराजगी
का प्रदर्शन है।आपके बहसो में ठहाकों और मुस्कानों ने अपनी उपयोगिता बनाए
रखी है।
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